मेरे सनकी अरबपति बनने से पहले

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अध्याय 190

समर की नज़र से

चमकते, पॉलिश किए हुए फ़र्श पर नोट इस तरह बिखरे पड़े थे जैसे किसी जनाज़े में काग़ज़ी फूल बरसा दिए हों—कड़क सौ-सौ और पचास-पचास के नोट, जिन्हें मैंने अपनी बिरकिन से मुट्ठियों में नोचकर निकाला था और उसके मुँह पर उछाल दिया था। अब बैग एक उँगली से लटका खाली और बेकार था, मेरी छाती हाँफ र...

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